
जिंदगी ये सोंचकर जीना, कि वो तेरी हबीब नहीं होगी ;
बस चार दिन बाद मौत से, बचने की तरकीब नहीं होगी !!
अब भी घर लौटने की बात सुनकर, बच्चे दर पे आ जाते हैं ;
उन्हें खबर नहीं कि अब्बा के हाथ में, कशीब नहीं होगी !!
तुम उनकी याद को अपने, सीने से लगाकर रखो हमेशा ;
कभी तुम न होगे पास, तो कभी वो करीब नहीं होगी !!
तुम्हारी हद की आखिरी मंजिल हो जहाँ तक, बोली बढ़ा लेना ;
माँ प्यार की सौदागरी में, किसी से भी गरीब नहीं होगी !!
हर एक आशिक से सुना है, उनकी रंगीन महफ़िल का हाल ;
तुम्हें पता नहीं कि उमराव में, अब वो तहजीब नहीं होगी !!
तमाम उम्र उनकी जुबान के, अल्फाज़ नहीं भुला पाया 'प्रसून' ;
कि तुझे अब मैं क्या ? मेरी लाश भी नसीब नहीं होगी !!
: - प्रसून दीक्षित 'अंकुर'