Wednesday, February 3, 2010

प्यार की सौदागरी . . .




जिंदगी ये सोंचकर जीना, कि वो तेरी हबीब नहीं होगी ;
बस चार दिन बाद मौत से, बचने की
तरकीब नहीं होगी !!


अब भी घर लौटने की बात सुनकर, बच्चे दर पे आ जाते हैं ;
उन्हें खबर नहीं कि अब्बा के हाथ में, कशीब नहीं होगी !!


तुम उनकी याद को
अपने, सीने से लगाकर रखो हमेशा ;
कभी तुम न होगे पास, तो कभी वो करीब नहीं होगी !!


तुम्हारी हद की आखिरी मंजिल हो जहाँ तक, बोली बढ़ा लेना ;

माँ प्यार की सौदागरी में, किसी से भी गरीब नहीं होगी !!


हर एक आशिक से सुना है, उनकी रंगीन महफ़िल का हाल ;

तुम्हें पता नहीं कि उमराव में, अब वो तहजीब नहीं होगी !!


तमाम उम्र उनकी जुबान के, अल्फाज़ नहीं भुला पाया 'प्रसून' ;

कि तुझे अब मैं क्या ? मेरी लाश भी नसीब नहीं होगी !!


: - प्रसून दीक्षित 'अंकुर'

10 comments:

  1. बाह क्या बात है बहुत ऊँची छलांग लगाई है ..एक खूबसूरत गज़ल...

    मज़ा आ गया..
    अंतिम शेर कबीले-इ-गौर है.
    सखी

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  2. Sakhi Ji,

    Aapka koti-koti dhanyawaad !

    Aapka isi prakaar ka pyaar hamein shakti dega !

    Shukriya !

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  3. बहुत ही उम्दा प्रस्तुति ! लाजवाब, खूबसूरत शेर लिखे हैं आपने ।
    आभार ।

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  4. Waah Prasoon kamaal ki gazal hai
    maan gareeb nahi hogi bahut khoobsurat
    yaad kareeb nahi hogi

    har sher bahut khoob raha

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  5. अच्छी ग़ज़ल .......बधाई......

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  6. वाह बहुत खूब , जनाब !!
    लिखते रहिये , अच्छा लिखते हैं ......
    शुभकामना .......

    http://shayarashok.blogspot.com/

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  7. तुम्हारी हद की आखिरी मंजिल हो जहाँ तक, बोली बढ़ा लेना ;
    माँ प्यार की सौदागरी में, किसी से भी गरीब नहीं होगी !!

    " खुबसूरत लगी ये पंक्तियाँ"
    regards

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