
जिंदगी ये सोंचकर जीना, कि वो तेरी हबीब नहीं होगी ;
बस चार दिन बाद मौत से, बचने की तरकीब नहीं होगी !!
अब भी घर लौटने की बात सुनकर, बच्चे दर पे आ जाते हैं ;
उन्हें खबर नहीं कि अब्बा के हाथ में, कशीब नहीं होगी !!
तुम उनकी याद को अपने, सीने से लगाकर रखो हमेशा ;
कभी तुम न होगे पास, तो कभी वो करीब नहीं होगी !!
तुम्हारी हद की आखिरी मंजिल हो जहाँ तक, बोली बढ़ा लेना ;
माँ प्यार की सौदागरी में, किसी से भी गरीब नहीं होगी !!
हर एक आशिक से सुना है, उनकी रंगीन महफ़िल का हाल ;
तुम्हें पता नहीं कि उमराव में, अब वो तहजीब नहीं होगी !!
तमाम उम्र उनकी जुबान के, अल्फाज़ नहीं भुला पाया 'प्रसून' ;
कि तुझे अब मैं क्या ? मेरी लाश भी नसीब नहीं होगी !!
: - प्रसून दीक्षित 'अंकुर'
बाह क्या बात है बहुत ऊँची छलांग लगाई है ..एक खूबसूरत गज़ल...
ReplyDeleteमज़ा आ गया..
अंतिम शेर कबीले-इ-गौर है.
सखी
Sakhi Ji,
ReplyDeleteAapka koti-koti dhanyawaad !
Aapka isi prakaar ka pyaar hamein shakti dega !
Shukriya !
बहुत ही उम्दा प्रस्तुति ! लाजवाब, खूबसूरत शेर लिखे हैं आपने ।
ReplyDeleteआभार ।
Waah Prasoon kamaal ki gazal hai
ReplyDeletemaan gareeb nahi hogi bahut khoobsurat
yaad kareeb nahi hogi
har sher bahut khoob raha
अच्छी ग़ज़ल .......बधाई......
ReplyDeletebahut hi achhi rachna
ReplyDeleteवाह बहुत खूब , जनाब !!
ReplyDeleteलिखते रहिये , अच्छा लिखते हैं ......
शुभकामना .......
http://shayarashok.blogspot.com/
wah kya bat hai
ReplyDeleteतुम्हारी हद की आखिरी मंजिल हो जहाँ तक, बोली बढ़ा लेना ;
ReplyDeleteमाँ प्यार की सौदागरी में, किसी से भी गरीब नहीं होगी !!
" खुबसूरत लगी ये पंक्तियाँ"
regards