Monday, January 25, 2010

क्या यही चिड़िया सोने वाली है ?




मेरी आँखों में केसरिया मेरी बातों में हरियाली है !
वही ख़ाक-ए-वतन खुशबू, वही गेहूं की बाली है !!



कोई सुर्खी लिए बैठा है, कहीं पे शांत सफेदी है !
कभी आओगे तो पूछोगे क्या यही चिड़िया सोने वाली है ?



नामुमकिन शब्द ही है एक बस न मानो तो सुन लो !
यही धरती भगत की और साबरमती संत वाली है !!



जमी से फलक तक हरसू नजर आ रहा तिरंगा मेरा !
है हिन्दोस्ताँ गुलिस्ताँ जैसे, तिरंगा इसका माली है !!



चलो हम भी करें कुछ देश की खातिर मेरे यारों !
हमारी रगों में भी तो एक चिंगारी सोलह-साली है !!



न बंद कमरों में रह-रह के वन्दे मातरम कहो !
बीती रात काली, सुबह कुछ नया करने वाली है !!

3 comments:

  1. जमी से फलक तक हरसू नजर आ रहा तिरंगा मेरा !
    है हिन्दोस्ताँ गुलिस्ताँ जैसे, तिरंगा इसका माली है !!
    वाह ! बेहद खुबसूरत प्रस्तुती...
    regards

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