Tuesday, December 29, 2009

एक बार . . .



तुमने तो केवल हमारी पलकों पे,
कुछ अधूरे ख्वाब ही सजवा दिए,



एक बार जो इस नक़्शे को,
इमारत में बदल दिया होता,


तो हम बस एक तुम्हारे होकर,
ही न रह जाते तो कहतीं !!


तुमने तो केवल किनारों पर ही पड़ी,
सीपियों से मोती चुन लिए,


एक बार जो इस समंदर में,
झाँककर देखा होता,


तो तुम्हारी आँखें इसमें पड़े कोहिनूरों से,
झिलमिला न उठती तो कहतीं !!


तुमने तो कुछ लतफ़हमियों में,
हमारी फूलती-फलती बगिया उजाड़ दी,

एक बार जो हमारे दिल की,
पुकार भी सुनी होती,

तो हम तुम्हारी राहों में अनगिनत,
'प्रसून' न बिछा देते तो कहतीं !!

6 comments:

  1. एक बार जो हमारे दिल की पुकार भी सुनी होती,

    तो हम तुम्हारी राहों में अनगिनत 'प्रसून' न बिछा देते ye lines
    sachme chhune wali hai..........
    har rachna me kuchh ankahe sawalon ke jawab nazar aate hain...........
    prasun ji bahut hi gahraai hai (dard) har nazm me.....

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  2. बहुत उमदा ख़यालात हैं जनाब
    मेरी तरफ़ से इस ख़ूबसूरत सौग़ात के लिये
    मुबारकबाद

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  3. सुंदर अभिव्यक्ति!

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  4. Bahut khub likha hai aapne....

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  5. चित्रों के साथ प्रविष्टि सुन्दर लग रही है ।

    पर चित्रों के साथ इतना मोह क्यों ? आपके चित्र की विराटता के आगे ब्लॉग सहम जा रहा है । उसे छोटा कर सकें तो ... वैसे साइडबार में भी लगा सकते हैं । अंकुर हैं न ! तनिक छोटा दिखिये (स्नेह से कह रहा हूँ ) ।

    आता रहूँगा । आभार ।

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  6. हमे भी चित्र बेहद खुबसूरत लगे खास कर वो सीपियों से मोती वाला ....

    regards

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